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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 54
लोभश्चेदगुणेन किं पिशुनता यद्यस्ति किं पातकैः सत्यं चेत्तपसा च किं शुचि मनो यद्यस्ति तीर्थेन किम् । सौजन्यं यदि किं गुणैः स्वमहिमा यद्यस्ति किं मण्डनैः सद्विद्या यदि किं धनैरपयशो यद्यस्ति किं मृत्युना ।।
यदि लोभ है तो और गुणों की जरुरत? यदि परनिन्दा या चुगलखोरी है, तो और पापों की क्या आवश्यकता? यदि सत्य है, तो तपस्या से क्या प्रयोजन? यदि मन शुद्ध है तो तीर्थों से क्या लाभ? यदि सज्जनता है तो गुणों की क्या जरुरत? यदि कीर्ति है तो आभूषणों की क्या आवश्यकता? यदि उत्तम विद्या है तो धन का क्या प्रयोजन? यदि अपयश है तो मृत्यु से और क्या होगा?
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