त्वमेव चातकाधारोડसीति केषां न गोचरः ।
किमम्भोदवराડस्माकं कार्पण्योक्तिः प्रतीक्ष्यते ।।
हे श्रेष्ठ मेघ! तुम्हीं हम पपहीयों के एकमात्र आधार हो, इस बात को कौन नहीं जानता? हमारे दीन वचनों की प्रतीक्षा क्यों करते हो? चातक कहता है – हे मेघ! संसार में नद, नदी और सरोवर आदि अनेक जलाशय हैं; हम प्यासे ही क्यों न मर जाएं, पर तुम्हारे सिवा हम किसी का जल नहीं पीते। तुम्हारे जल के सिवा गङ्गा, जमुना, सरस्वती और सिंधु प्रभृति हमारे लिए धूल हैं। हम लोगों को तुम्हारा ही आश्रय है। इस दशा में तुम्हें उचित नहीं है, कि तुम हमसे बार बार दीनता कराओ।
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