मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 51
त्वमेव चातकाधारोડसीति केषां न गोचरः । किमम्भोदवराડस्माकं कार्पण्योक्तिः प्रतीक्ष्यते ।।
हे श्रेष्ठ मेघ! तुम्हीं हम पपहीयों के एकमात्र आधार हो, इस बात को कौन नहीं जानता? हमारे दीन वचनों की प्रतीक्षा क्यों करते हो? चातक कहता है – हे मेघ! संसार में नद, नदी और सरोवर आदि अनेक जलाशय हैं; हम प्यासे ही क्यों न मर जाएं, पर तुम्हारे सिवा हम किसी का जल नहीं पीते। तुम्हारे जल के सिवा गङ्गा, जमुना, सरस्वती और सिंधु प्रभृति हमारे लिए धूल हैं। हम लोगों को तुम्हारा ही आश्रय है। इस दशा में तुम्हें उचित नहीं है, कि तुम हमसे बार बार दीनता कराओ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
नीति शतकम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

नीति शतकम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें