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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 5
लभेत सिकतासु तैलमपि यत्नत: पीडयन्पिबेच्च मृगतृष्णिकासु सलिलं पिपासार्दित:। कदाचिदपि पर्यटन् शशविषाणमासादयेत्न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत् ।
कदाचित कोई किसी तरकीब से बालू में से भी तेल निकल ले, कदाचित कोई प्यासा मृगतृष्णा के जल से भी अपनी प्यास शान्त कर ले; कदाचित कोई पृथ्वी पर घुमते घुमते घरगोश का सींग भी खोज ले; परन्तु हठ पर चढ़े हुए मूर्ख मनुष्य के चित्त को कोई भी अपने काबू में नहीं कर सकता।
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