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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 48
सत्याअन्रिता च परूशा प्रियवादिनी च हिन्सा दयालुरपि चार्थपरा वदान्या । नित्यव्यया प्रचुरनित्यधनागमा च वेश्यान्गनेव न्रिप नीतिरनेकरूपा॥
राजनीति, वेश्या की नाइ अनेक रूपिणी होती है। कहीं यह सत्यवादिनी और कहीं असत्यवादिनी, कहीं कटुभाषिणी और कहीं प्रियभाषिणी, कहीं हिंसा करने वाली और कहीं दयालु, कहीं लोभी और कहीं उदार, कहीं अपव्यय करने वाली और कहीं धन सञ्चय करने वाली होती है।
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