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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 46
मणि: शाणोल्लीढ: समरविजयी हेतनिहतो मदक्षिणो नाग: शरदि सरित: श्यानपुलिनाः । कलाशेषश्चन्द्र: सुरत्मृदित बालवनिता तनिम्ना: शोभन्ते गलितविभवाश्चार्थिषु जनाः ॥
सान पर खरादी हुई मणि, हथियारों से घायल विजयी योद्धा, मदक्षीण (कमज़ोर) हाथी, शरद ऋतू की सूखे किनारों और अल्पजळ वाली नदी, कलाहीन दूज का चन्द्रमा, सुरत के मर्दन चुम्बन आदि से थकी हुई नवयुवती और अपना सारा ही धन दान करके दरिद्र हुए सज्जन पुरुष – ये सब अपनी हानि या दुर्बलता से ही शोभा पाते हैं।
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