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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 45
दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयः भवन्ति वित्तस्य । यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति ॥
दान, भोग और नाश – धन की यही तीव्र गति है। जिसने न दिया और न भोगा उसके धन की तीसरी गति होती है।
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