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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 43
वर वन व्याघ्रगजेन्द्र सेवितं।द्रुमालयः पक्व फलाम्बु भोजनं।। तृणानि शय्या परिधान वल्कलं।न बन्धुमध्ये धनहीनजीवनं।।
सिंह व्याघ्रादि वाले वन में पेड़ के नीचे बसना, पके पके फल खाना, जल पीना और घास की शय्या पर सोना भला है; पर भाई बन्धुओं के बीच में निर्धन होकर रहना भला नहीं।
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