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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 41
तानीन्द्रियाणि सकलानि तदेव कर्मसा बुद्धिरप्रतिहता वचनं तदेव । अर्थोष्मणा विरहितः वचनं तदेव त्वन्यः क्षणेन भवतीति विचित्रमेतत् ॥
सारी इन्द्रियां वे की वे ही हैं, काम भी सब वैसे ही हैं, परंतु एक धन की गर्मी बिना वही पुरुष और का और हो जाता है। निस्संदेह यह एक विचित्र बात है।
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