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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 40
जातिर्यातु रसातलं गुणगणस्तस्याप्यधो गच्छतु शीलं शैलतटात्पतत्वभिजनः संदह्यतां वह्निना । शौर्ये वैरिणि वज्रमाशुनिपतत्वर्थोડस्तु नः केवलंयेनैकेन विना गुणास्तृणलवप्रायाः समस्ता इमे ॥
यदि जाति पाताल को चली जाय, सारे गुण पाताळ से भी नीचे चले जाएं, शील पर्वत से गिर कर नष्टभो जाये, स्वजन अग्नि में कर भस्म हो जाएं और वैरिन शूरता पर वज्रपात हो जाये – तो कोई हर्ज नहीं, लेकिन हमारा धन नष्ट न हो, हमें तो केवल धन चाहिए, क्योंकि धन के बिना मनुष्य के सारे गुण तिनके की तरह निकम्मे हैं।
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