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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 4
प्रसह्य मणिमुद्धरेन्मकरदंष्ट्रान्तरात् समुद्रमपि सन्तरेत् प्रचलदुर्मिमालाकुलाम् । भुजङ्गमपि कोपितं शिरसि पुष्पवद्धारयेत् न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत् ।।
यदि मनुष्य चाहे तो मकर की दाढ़ों की नोक में से मणि निकल लेने का उद्योग भले ही करे; यदि चाहे तो चञ्चल लहरों से उथल-पुथल समुद्र को अपनी भुजाओं से तैर कर पार कर जाने की चेष्टा भले ही करे, क्रोध से भरे हुए सर्प को पुष्पहार की तरह सर पर धारण करने का साहस करे तो भले ही करे, परन्तु हठ पर चढ़े हुए मूर्ख मनुष्य के चित्त की असत मार्ग से सात मार्ग पर लाने की हिम्मत कभी न करे।
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