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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 38
यदचेतनोડपि पादैः स्पृष्टः प्रज्वलति सवितुरिनकान्तः । तत्तेजस्वी पुरुषः परकृतविकृतिं कथं सहते॥
जब चेतना रहित सूर्यकान्त मणि भी सूर्य किरण रूप पैरों के लगने से जल उठती है, तब चेतना सहित तेजस्वी पुरुष, पर का किया अपमान कैसे सह सकते हैं?
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