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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 37
वरं पक्षच्छेदः समदमघवन्मुक्तकुलिश-प्रहारैरुद्गच्छद्बहलदहनोद्गारगुरुभिः । तुषाराद्रेः सूनोरहह पितरि क्लेशविवशेन चासौ सम्पातः पयसि पयसां पत्युरुचितः॥
हिमालय पुत्र मैनाक ने पिता को संकट में छोड़ कर, अपनी रक्षा के लिए समुद्र की शरण ली – यह काम उसने अच्छा नहीं किया। इससे तो यही अच्छा होता, कि मैनाक स्वयं भी मदोन्मत्त इन्द्र के अग्निज्वाला उगलनेवाले वज्र से अपने भी पंख कटवा लेता।
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