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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 34
सन्त्यन्येડपि बृहस्पतिप्रभृतयः सम्भाविताः पञ्चषास्तान्प्रत्येषविशेषविक्रमरुची राहुर्न वैरायते । द्वावेव ग्रसते दिनेश्वरनिशाप्राणेश्वरौ भासुरौभ्रान्तः पर्वणि पश्य दानवपतिः शीर्षावशेषीकृतः॥
आकाश में बृहस्पति प्रभृत्ति और भी पांच छः ग्रह श्रेष्ठ हैं, पर असाधारण पराक्रम दिखाने की इच्छा रखनेवाला राहु इन ग्रहों से बैर नहीं करता। यद्यपि दानवपति का सिर मात्र अवशेष रह गया है तो भी वह अमावस्या और पूर्णिमा को – दिनेश्वर सूर्य और निशानाथ चन्द्र को ही ग्रास करता है। महापुरुषों का स्वाभाव होता है कि वो छोटो से वैरभाव नहीं करते क्योंकि छोटो को जीतने से नेकनामी नहीं मिलती पर हार जाने पर बदनामी होती है – छोटो से जीतने पर भी हार और हारने पर भी हार। महापुरुष, इसलिए, अपने समान या अधिक बलवानों से ही युद्ध करते हैं।
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