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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 33
कुसुमस्तबकस्येव द्वे गती स्तो मनस्विनाम् । मूर्ध्नि वा सर्वलोकस्य विशीर्यते वनेડथवा॥
फूलों के गुच्छे की तरह महापुरुषों की गति दो प्रकार की होती है – या तो वे सब लोगो के सिर पर ही विराजते हैं अथवा वन में पैदा होकर वन में ही मुरझा जाते हैं।
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