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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 30
स्वल्पं स्नायुवसावशेषमलिनं निर्मांसमप्यस्थि गोः श्वा लब्ध्वा परितोषमेति न तु तत्तस्य क्षुधाशान्तये । सिंहो जम्बुकमङ्कमागतमपि त्यक्त्वा निहन्ति द्विपं सर्वः कृच्छगतोपि वाञ्छति जनः सत्त्वानुरूपं फलम् ।।
कुत्ता, गाय प्रभृत्ति पशु का जरा सा पित्त और चर्बी लगा हुआ मलिन और मांसहीन छोटा सा हाड का टुकड़ा पाकर – जिससे उसकी क्षुधा शांत नहीं हो सकती – अत्यन्त प्रसन्न होता है, लेकिन सिंह गोद में आये हुए सियार को भी त्याग कर हाथी के मरने को दौड़ता है।
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