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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 3
अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्य्ते विशेषज्ञ: । ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मापि नरं न रञ्जयति।।
हिताहितज्ञानशून्य नासमझ को समझाना बहुत आसान है, उचित और अनुचित को जानने वाले ज्ञानवान को राजी करना और भी आसान है; किन्तु थोड़े से ज्ञान से अपने को पण्डित समझने वाले को स्वयं विधाता भी सन्तुष्ट नहीं कर सकता।
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