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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 29
क्षुत्क्षामोऽपि जराकृशोऽपि शिथिलप्राणोऽपि कष्टां दशाम् आपन्नोऽपि विपन्नदीधितिरिति प्राणेषु नश्यत्स्वपि । मत्तेभेन्द्रविभिन्नकुम्भपिशितग्रासैकबद्धस्पृहः किं जीर्णं तृणमत्ति मानमहतामग्रेसरः केसरी ॥
जो सिंह माननीयों में अगुआ है और जो सदा मतवाले हाथियों के विदारे हुए मस्तक के ग्रास का चाहनेवाला है, वह चाहे कितना ही भूख, बुढ़ापे के मारे शिथिल, शक्तिहीन अत्यंत दुःखी और तेजहीन क्यों न हो जाय – पर वह प्राणनाश का समय आने पर भी, सूखी हुई, सड़ी घास खाने को हरगिज़ तैयार न होगा।
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