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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 28
असन्तो नाभ्यर्थाः सुहृदपि न याच्यः कृशधनः । प्रिया न्यायया वृत्ति र्मलिनमसभंगेऽप्यसुकरम्।। विपद्युच्चैः स्थेयं पदमनुविधेयं च महताम्। सतां केनोद्रिष्टं विषमसिधाराव्रत मिदम् ॥
सत्पुरुष दुष्टों से याचना नहीं करते, थोड़े धन वाले मित्रों से भी कुछ नहीं मांगते, न्याय की जीविका से संतुष्ट रहते हैं, प्राणों पर बन आने पर भी पाप कर्म नहीं करते, विषाद काल में वे ऊँचे बने रहते हैं यानी घबराते नहीं और महत पुरुषों के पदचिन्हों का अनुसरण करते हैं। इस तलवार की धार के सामान कठिन व्रत का उपदेश उन्हें किसने दिया? किसी ने नहीं, वे स्वभाव से ही ऐसे होते हैं। मतलब ये है कि सत्पुरुषों में उपरोक्त गुण किसी के सिखाने से नहीं आते, उनमें ये सब गुण स्वभाव से या पैदाइशी होते हैं।
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