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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 21
क्षान्तिश्चेत्कवचेन किं, किमिरिभिः क्रोधोऽस्ति चेद्देहिनां ज्ञातिश्चेदनलेन किं यदि सुहृद्दिव्यौषधिः किं फलम् । किं सर्पैर्यदि दुर्जनः, किमु धनैर्वुद्यानवद्या यदि व्रीडा चेत्किमु भूषणैः सुकविता यद्यस्ति राज्येन किम् ।।
यदि क्षमा है तो कवच की क्या आवश्यकता? यदि क्रोध है तो शत्रुओं की क्या जरुरत है? यदि स्वजातीय है तो अग्नि का क्या प्रयोजन? यदि सुन्दर ह्रदय वाले मित्र हैं, तो आशुफलप्रद दिव्य औषधियों से क्या लाभ? यदि दुर्जन है तो सर्पों से क्या? यदि निर्दोष विद्या है तो धन से क्या प्रयोजन? यदि लज्जा है तो जेवरों की क्या जरुरत? यदि सुन्दर कविताशक्ति है तो राजवैभव का क्या प्रयोजन?
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