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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 18
अम्भोजिनीवनवासविलासमेव, हंसस्य हन्ति नितरां कुपितो विधाता । न त्वस्य दुग्धजलभेदविधौ प्रसिद्धां, वैदग्ध्यकीर्तिमपहर्तुमसौ समर्थः ।।
अगर विधाता हंस से नितान्त ही कुपित हो जाय, तो उसका कमलवन का निवास और विलास नष्ट कर सकता है, किन्तु उसकी दूब और पानी को अलग अलग कर देने की प्रसिद्ध चतुराई की कीर्ति को स्वयं विधाता भी नष्ट नहीं कर सकता।
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