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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 16
हर्तुर्याति न गोचरं किमपि शं पुष्णाति यत्सर्वदा ह्यार्थिभ्यः प्रतिपाद्यमानमनिशं प्राप्नोति वृद्धिं पराम् || कल्पान्तेष्वपि न प्रयाति निधनं विद्याख्यमन्तर्धनं येषां तान्प्रति मानमुज्झत नृपाः कस्तैः सह स्पर्धते ।।
विद्या एक ऐसा धन है जो एक चोर को भी नहीं दिखाई देता है पर फिर भी जिस के पास भी यह धन होता है वह सदैव सुखी रहता है। निश्चय ही विद्या प्राप्त करने के इच्छुक व्यक्तियों को दान देने से यह दान दाता के सम्मान में तथा स्वयं भी निरन्तर वृद्धि प्राप्त करता है और कल्पान्त तक (लाखों वर्षों तक ) इसका नाश नहीं हो सकता है। इसी लिये विद्या को लोग एक गुप्त धन कहते हैं और इसी लिये महान राजा भी ऐसे विद्या धन से संपन्न व्यक्ति के प्रति अपने गर्व को त्याग कर उसका सम्मान करते हैं। भला ऐसे व्यक्ति से कौन स्पर्धा कर सकता है?
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