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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 15
शास्त्रोपस्कृत शब्द सुन्दरगिरः शिष्यप्रदेयागमाः विख्याताः कवयो वसंति विषये यस्य प्रभोर्निर्धनाः| तज्जाड्यं वसुधाधिपस्य सुधियस्त्वर्थं विनापीश्वराः कुत्स्याःस्युः कुपरीक्षैर्न मणयो यैरर्घतः पातिताः।।
जिन कवियों की वाणी शास्त्राध्ययन की वजह से शुद्ध और सुन्दर है, जिनमें शिष्यों को पढ़ाने की योग्यता है, जो अपनी योग्यता के लिए सुप्रसिद्ध हैं – ऐसे विद्वान् जिस राजा के राज्य में निर्धन रहते हैं वह राजा निस्संदेह मूर्ख है। कविजन तो बिना धन के भी श्रेष्ठ ही होते हैं। रत्नपारखी अगर रत्न का मोल घटा दे तो रत्न का मूल्य काम न हो जायेगा, रत्न का मूल्य तो जितना है उतना ही बना रहेगा, मूल्य घटने वाला अनाड़ी समझ जायेगा।
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