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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 14
वरं पर्वतदुर्गेषु भ्रान्तं वनचरैः सह। न मूर्खजनसम्पर्कः सुरेन्द्रभवनेष्वप ।।
बियावान जंगल और पर्वतों के बीच खूंखार जानवरों के साथ रहना अच्छा है किंतु अगर मूर्ख के साथ इंद्र की सभा में भी बैठने का अवसर मिले तो भी उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए।
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