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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 12
साहित्यसंगीतकलाविहीनः साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः । तृणं न खादन्नपि जीवमानः तद्भागधेयं परमं पशूनाम्।।
जो मनुष्य साहित्य और संगीत कला से विहीन है, यानि जो साहित्य और संगीत शास्त्र का जरा भी ज्ञान नहीं रखता या इनमें अनुराग नहीं रखता, वह बिना पूँछ और सींग का पशु है। यह घास नहीं खाता और जीता है, यह इतर पशुओं का परम सौभाग्य है।
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