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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 10
शिरः शार्वं स्वर्गात् पशुपतिशिरस्तः क्षितिधरम्। महीध्रादुत्तुङगादवनिमवनेश्चापि जलधिम्। अधो गङ्गा सेयं पदमुपगता स्तोकमथवा। विवेकभ्रष्टानां भवति विनिपातः शतमुखः ।।
गङ्गा पहले स्वर्ग से शिव के मस्तक पर गिरी, उनके मस्तक से हिमालय पर्वत पर गिरी, वहां से पृथ्वी पर गिरी और पृथ्वी से बहती बहती समुद्र में जा गिरी । इस तरह ऊपर से नीचे गिरना आरम्भ होने पर, गङ्गा नीचे ही नीचे गिरी और स्वल्प हो गयी । गङ्गा की सी ही दशा उन लोगों की होती है, जो विवेक-भ्रष्ट हो जाते हैं, उनका भी अधःपतन गङ्गा की ही तरह सौ-सौ तरह होता है।
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