अपनी इन्द्रियों का निग्रह करना ही उन (परिव्राजक संन्यासियों) का नियम होता है।
भय, मोह, शोक एवं क्रोध का परित्याग करना ही उनका त्याग है।
वे परब्रह्म के साथ एकत्व का रसास्वादन करते हैं।
अनियामकत्व (न किसी को वश में करना और न ही किसी का तिरस्कार करना) ही उनकी निर्मल शक्ति होती है।
वे स्व प्रकाशित ब्रह्म तत्त्व में शिव-शक्ति से संपुटित प्रपञ्च का उच्छेदन करते हैं।
वे पत्र (कारण शरीर), अक्ष (सूक्ष्म शरीर) और अक्षि (स्थूल शरीर) इन तीनों शरीरों के भाव और अभाव को दग्ध (विनष्ट) करने वाले होते हैं।
वे आकाशरूपी आधार को धारण करने वाले होते हैं।
तुरीयावस्था में स्थित शिव अथवा ब्रह्म ही उनका यज्ञोपवीत और शिवमयी (ब्रह्ममयी ज्ञान) शक्ति ही उनकी शिखा है।
चिन्मय स्वरूप होने के कारण उनकी दृष्टि में स्थावर और जङ्गम समूची सृष्टि ब्रह्म ही है।
कर्मों को निर्मूल कर देना (अर्थात् कर्मफल से न बंधना) ही उनकी कथा है।
वे माया, ममता और अहंकार को दग्ध कर डालने के लिए श्मशान भूमि में अनाहत अंग (अवधूत-विदेह) होकर विचरण करते हैं।
जो त्रिगुणातीत हैं, निज स्वरूप के अनुसन्धान और भ्रान्ति के हनन में ही जिनका समय लगता है; जो काम आदि वृत्तियों का दहन करते रहते हैं, जो कौपीन धारण करके कठोरतापूर्वक संयम का पालन करते हैं, जो चिरकाल तक मृगचर्म रूप वस्त्र धारण करते हैं, जो निरन्तर अक्रिया द्वारा ही अनाहत नाद रूप मन्त्र का सेवन करते हैं; उन (संन्यासी परिव्राजकों) का स्वभाव स्वेच्छाचारी (अपनी आत्मा के निर्देश के अनुरूप आचरण करने वाला) होता है, यही उनका मोक्ष है।
परब्रह्म स्वरूप लक्ष्य की प्राप्ति हेतु ज्ञानरूपी नौका के समान आचरण करने वाला अवधूत पहले ब्रह्मचर्य द्वारा शान्ति प्राप्त करता है।
ब्रह्मचर्याश्रम में अध्ययन के उपरान्त वानप्रस्थ आश्रम में भी अध्ययन (चिन्तन- मनन-निदिध्यासन) करता है और ज्ञान सम्पन्न होकर समस्त ज्ञान (लौकिक ज्ञान) का परित्याग कर देता है - यही संन्यास है।
अन्त में नित्य ब्रह्म के अखण्ड आकार की स्थिति में पहुँचकर समस्त संशयों का नाश कर देता है।
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