मन का निरोध करने वाली प्रवृत्ति ही कन्या (गुदड़ी) है।
(संन्यासीगण) योग के द्वारा परब्रह्म के सदानन्द स्वरूप का दर्शन करते हैं।
वे (परिव्राजक संन्यासी) आनन्दरूप भिक्षा का ही भोजन करते हैं।
वे महाश्मशान में भी आनन्द वन की भाँति निवास करते हैं।
एकान्त स्थल ही उनका मठ होता है।
उनकी उन्मनी (निर्विकल्पक) अवस्था तथा शारदा (उज्ज्वल) चेष्टा होती है।
उनकी उन्मनी निर्विकल्पकरूपा गति होती है।
उनका निर्मल शरीर और आश्रयरहित आसन होता है।
अमृत रूपी महान् सागर की तरंगों में आनन्दित रहना ही उनकी क्रिया है।
चिदाकाश ही उनका महा सिद्धान्त है।
शम, दम आदि दिव्य शक्तियों के आचरण (व्यवहार) में क्षेत्र और पात्र का ध्यान रखना उनकी पटुता (कुशलता) है।
परावर (ब्रह्म) के साथ संयोग ही उनका तारक उपदेश है।
अद्वैत सदानन्द ही उनका देवता है।
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