धैर्य उन (संन्यासियों) की गुदड़ी है।
उदासीन प्रवृत्ति उनकी कौपीन (लँगोटी) है।
विचार ही उनका दण्ड है, ब्रह्म का अवलोकन ही उनका योगपट्ट है, सम्पदा उनकी पादुका है (धन-सम्पदा को वे पैर की जूतो की तरह तुच्छ वस्तु समझते हैं)।
परेच्छा ही उनका आचरण है (ईश्वर की इच्छा से ही वे देह धारण और चेष्टा करते हैं)।
कुण्डलिनी ही उनका बन्ध है।
वे परापवाद (परनिन्दा) से मुक्त होकर जीवन्मुक्त होते हैं।
कल्याणकारी ईश्वर के साथ योग ही उनकी निद्रा है।
उस निद्रा और खेचरी मुद्रा को धारण करके वे परमानन्द का अनुभव करते हैं।
वह (ब्रह्म) तीनों गुणों से अतीत अर्थात् त्रिगुणातीत-निर्गुण है।
वह विवेक द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।
वह, मन और वाणी द्वारा प्राप्य नहीं है अर्थात् वह मन और वाणी का अविषय है।
(जिस प्रकार) यह जगत् अनित्य है, इससे जो जन्मा है, वह स्वप्न के संसार की तरह और आकाश में बने बादलों के हाथी आदि की तरह मिथ्या है, उसी प्रकार यह देह आदि संघात, मोह आदि दोषों से युक्त है और यह सब रस्सी में सर्प की भ्रान्ति के समान मिथ्या है।
विष्णु, विधि (ब्रह्मा) आदि सैकड़ों नामों वाला ब्रह्म ही लक्ष्य है।
इन्द्रियों पर अंकुश रखना ही (ब्रह्म प्राप्ति का) मार्ग है।
ब्रह्म प्राप्ति का वह मार्ग शून्य संकेत (विष्णु आदि देव शक्तियों से रहित) नहीं है।
समस्त जीवों पर ईश्वर की सत्ता है।
सत्य और सिद्ध हुआ योग ही (संन्यासी का) मठ है।
अमर पद (स्वर्ग) उस (ब्रह्म) का स्वरूप नहीं है।
आदि ब्रह्म से स्व की एकरूपता ही ज्ञान है।
उक्तभाव (सोऽहं) का अजपा जप ही गायत्री है।
विकारों के ऊपर नियन्त्रण पाना ही ध्येय है।
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