उनका अभ्यास उच्चस्थिति के लिए होता है।
उनका आसन आश्रयरहित होता है।
परमात्मा (ईश्वर) के साथ संयोग ही उनकी दीक्षा है।
संसार से वियोग करना (मुक्त होना) ही उनका उपदेश है।
दीक्षा लेकर सन्तोष करना ही उनका पावन कर्म करना है।
द्वादश आदित्यों का (प्रलयकाल का) वे दर्शन करते हैं (क्योंकि प्रलय काल में ही द्वादश आदित्य एक साथ उदीयमान होते हैं)।
वे विवेक के द्वारा अपनी रक्षा करते हैं।
दया (करुणा) ही उनकी क्रीड़ा (खेल) है।
आत्मिक आनन्द ही उनकी माला है।
एकान्त रूपी गुहा में मुक्त होकर सुखपूर्वक बैठना ही उनकी गोष्टी है।
(अपने हाथ से) न बनाया हुआ, (अपितु माँग कर प्राप्त किया हुआ) भोजन ही उनकी भिक्षा है।
वे हंसाचारी होते हैं अर्थात् उनका आचरण हंसों जैसा (नीरक्षीरविवेकी) होता है।
समस्त प्राणियों के अन्तर में रहने वाला आत्मा ही हंस है, ऐसा उनका प्रतिपादन है।
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