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निर्वाण षटकम् • अध्याय 1 • श्लोक 2
न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायु: न वा सप्तधातुर् न वा पञ्चकोश: न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायू चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥
मैं प्राण संज्ञा नहीं हूँ, न मैं पंच-प्राण स्वरूप ही(पंचप्राण- प्राण, उदान, अपान, व्यान, समान) हूँ, न सप्त धातु (सप्तधातु- त्वचा, मांस, मेद, रक्त, पेशी, अस्थि, मज्जा) हूँ और नहीं पंचकोश (पंचकोश- अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनन्दमय) हूँ, और न ही मैं माध्यम हूँ निष्कासन, प्रजनन, सुगति, संग्रहण और वचन (गुदा, जननेन्द्रिय, पैर, हाथ, वाणी) का; वस्तुतः मैं चिर आनन्द हूँ, चिन्मय रूप शिव हूँ, शिव हूँ।
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