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मुद्गल • अध्याय 4 • श्लोक 10
य एतदुपनिषदं नित्यमधीते सोऽग्निपूतो भवति। स वायुपूतो भवति। स आदित्यपूतो भवति। अरोगी भवति। श्रीमांश्च भवति। पुत्रपौत्रादिभिः समृद्धो भवति। विद्वांश्च भवति। महापातकात्पूतो भवति। सुरापानात्पूतो भवति । अगम्यागमनात्पूतो भवति। मातृगमनात्पूतो भवति। दुहितृस्नुषाभिगमनात्पूतो भवति। स्वर्णस्तेयात्पूतो भवति।वेदिजन्महानात्पूतो भवति। गुरोरशुश्रूषणात्पूतो भवति। अयाज्ययाजनात् पूतो भवति। अभक्ष्यभक्षणात् पूतो भवति। उग्रप्रतिग्रहात्पूतो भवति। परदारगमनात्पूतो भवति। कामक्रोधलोभमोहेष्यदिभिरबाधितो भवति। सर्वेभ्यःपापेभ्यो मुक्तो भवति। इह जन्मनि पुरुषो भवति॥
जो पुरुष इस उपनिषद् का नित्य अध्ययन करता है, वह अग्नि के समान पवित्र हो जाता है। वह वायु के समान पवित्र हो जाता है। वह आदित्य के समान पवित्र हो जाता है। वह आरोग्यवान् होता है। वह श्रीसम्पन्न होता है। वह पुत्र, पौत्र आदि से सम्पन्न होता है। वह विद्वान् होता है। वह महापातकों से पवित्र हो जाता है। वह सुरापान के पाप से पवित्र हो जाता है। वह अगम्यागमन के दोष से पवित्र हो जाता है। वह माता के साथ संबंध के पाप से पवित्र हो जाता है। वह पुत्री और पुत्रवधू के साथ संबंध के पाप से पवित्र हो जाता है। वह स्वर्ण-चोरी के पाप से पवित्र हो जाता है। वह वेदविहित कर्मों के त्याग से उत्पन्न दोष से पवित्र हो जाता है। वह गुरु की सेवा न करने के दोष से पवित्र हो जाता है। वह अयोग्य के लिए यज्ञ कराने के दोष से पवित्र हो जाता है। वह अभक्ष्य पदार्थों के सेवन के दोष से पवित्र हो जाता है। वह अनुचित प्रतिग्रह (अनुचित दान ग्रहण करने) के दोष से पवित्र हो जाता है। वह परस्त्रीगमन के पाप से पवित्र हो जाता है। वह काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या आदि दोषों से पीड़ित नहीं होता। वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। और इस जन्म में ही वह पुरुष (परम पुरुषस्वरूप की प्राप्ति करने वाला) हो जाता है। (उपनिषद् के हम वाक्य का अर्थ विवेकपूर्वक किया जाना चाहिए। बहुधा लोग इसका यह अर्थ लगाते हैं कि पाप वृत्तियों के वशीभूत हो जो पापकर्म करता है, उसके दण्ड से मुक्त हो जाता है, लेकिन ऋषि कहते हैं कि वह ज्ञानी विभिन्न पाप वृत्तियों-अन्तरंग दोषों से मुक्त हो जाता है, न कि पाप कर्मों के दण्ड से। ज्ञानी अपनी ज्ञान दृष्टि से वास्तविकता को पहचान लेता है, इसलिए पाप वृत्तियों के प्रलोभन में फँसता ही नहीं है।)
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