वह ब्रह्मतापत्रय(आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक दुःखों) से परे है।
वह षट्कोशों से पूर्णतः मुक्त, षडूर्मियों(भूख, प्यास, शोक, मोह, जरा और मृत्यु) से रहित, तथा पञ्चकोशों से अतीत है।
वह षड्भाव-विकारों(जन्म, अस्तित्व, वृद्धि, परिवर्तन, क्षय और विनाश) से भी सर्वथा शून्य है।
इस प्रकार वह ब्रह्म इन सब और अन्य समस्त उपाधियों से सर्वथा विलक्षण, परे और निरपेक्ष स्वरूप वाला है।
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