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मनुस्मृति • अध्याय 3 • श्लोक 88
मरुद्भ्य इति तु द्वारि क्षिपेदप्स्वद्भ्य इत्यपि ?? । वनस्पतिभ्य इत्येवं मुसलोलूखले हरेत् ॥
'मरुतों की वंदना' कहकर कुछ अन्न द्वार के पास बिखेर देना चाहिए और कुछ जल में, 'जलों की वंदना' कहकर। वह कुछ मूसल और ओखली पर यह कहकर फेंके, कि 'वृक्षों को प्रणाम'।
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