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मनुस्मृति • अध्याय 3 • श्लोक 73
अहुतं च हुतं चैव तथा प्रहुतमेव च । ब्राह्म्यं हुतं प्राशितं च पञ्चयज्ञान् प्रचक्षते ? ॥
वे इन पाँच यज्ञों को भी कहते हैं - (1) "अहुत" (2) "हुत," (3) "प्रहुत," (4) "ब्रह्म्य-हुत" और (5) "प्रशिता"।
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