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मनुस्मृति • अध्याय 3 • श्लोक 266
हविर्यच्चिररात्राय यच्चानन्त्याय कल्पते । पितृभ्यो विधिवद् दत्तं तत् प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥
अब मैं पूर्ण रूप से वर्णन करूँगा कि पितरों को अर्पित की जाने वाली कौन-सी अर्पण-सामग्री उनके कार्य के अनुसार दीर्घकाल तक, चिरकाल तक काम आती है।
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