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मनुस्मृति • अध्याय 3 • श्लोक 259
दातारो नोऽभिवर्धन्तां वेदाः सन्ततिरेव च । श्रद्धा च नो मा व्यगमद् बहुदेयं च नोऽस्त्विति ॥
'हमारे परोपकारी समृद्ध हों! जैसा कि वेद और हमारी संतानें भी हैं! हमारा विश्वास कभी न डगमगाए! हमारे पास देने के लिए बहुत कुछ हो!'
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