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मनुस्मृति • अध्याय 3 • श्लोक 237
यावदुष्मा भवत्यन्नं यावदश्नन्ति वाग्यताः । पितरस्तावदश्नन्ति यावन्नओक्ता हविर्गुणाः ॥
जब तक भोजन भाप बन रहा है, जब तक वे वाणी को संयमित करके खाते हैं, तब तक पितर भोजन करते हैं, जब तक भोजन के गुणों का वर्णन नहीं किया जाता।
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