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मनुस्मृति • अध्याय 3 • श्लोक 216
न्युप्य पिण्डांस्ततस्तांस्तु प्रयतो विधिपूर्वकम् । तेषु दर्भेषु तं हस्तं निर्मृज्याल्लेपभागिनाम् ॥
विधिपूर्वक उन रोटियों को चढाकर शुद्ध होकर उसी हाथ से कुशा के उन तिनकों की जड़ों से उन तीनों पितरों के निमित्त पोंछे जो मसह ग्रहण करते हैं।
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