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मनुस्मृति • अध्याय 3 • श्लोक 141
सम्भोजानि साऽभिहिता पैशाची दक्षिणा द्विजैः । इहैवास्ते तु सा लोके गौरन्धेवैकवेश्मनि ॥
इस खुशमिजाज रात्रिभोज को द्विज लोगों ने "शैतानों का उपहार" कहा है। वह इस संसार में अकेली रहती है, जैसे एक कमरे में बंधी अंधी गाय।
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