यस्य मित्रप्रधानानि श्राद्धानि च हवींषि च ।
तस्य प्रेत्य फलं नास्ति श्राद्धेषु च हविःषु च ॥
जिसके श्राद्धों और यज्ञों में मित्र प्रधान होता है, उसके लिए मृत्यु के पश्चात् न तो श्राद्धों का और न ही यज्ञों का कोई फल मिलता है।
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