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मनुस्मृति • अध्याय 3 • श्लोक 133
यावतो ग्रसते ग्रासान् हव्यकव्येष्वमन्त्रवित् । तावतो ग्रसते प्रेतो दीप्तशूलर्ष्ट्ययोगुडान् ॥
वेदों से अनभिज्ञ व्यक्ति देवताओं और पितरों को दिए गए प्रसाद में से जितने कौर निगलता है, उतने ही जलते हुए कांटे, भाले और लोहे के गोले मनुष्य मरने के बाद निगल लेता है।
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