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मनुस्मृति • अध्याय 3 • श्लोक 100
शिलानप्युञ्छतो नित्यं पञ्चाग्नीनपि जुह्वतः । सर्वं सुकृतमादत्ते ब्राह्मणोऽनर्चितो वसन् ॥
एक ब्राह्मण किसी के घर में असम्मानित रहने से उसका सारा पुण्य हर लेता है, भले ही वह एक हो जो फसल की बूंदों को इकट्ठा करके निर्वाह करता है, या पाँच अग्नियों में आहुति देता है।
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