श्रुत्वा स्पृष्ट्वा च दृष्ट्वा च भुक्त्वा घ्रात्वा च यो नरः ।
न हृष्यति ग्लायति वा स विज्ञेयो जितैन्द्रियः ॥
जो इन्द्रियों को वश में कर लेता है, वही मनुष्य कहलाता है, जो किसी वस्तु को सुनकर, छूकर, देखकर, चखकर, सूंघकर न हर्षित होता है, न शोक करता है।
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