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मनुस्मृति • अध्याय 2 • श्लोक 97
वेदास्त्यागश्च यज्ञाश्च नियमाश्च तपांसि च । न विप्रदुष्टभावस्य सिद्धिं गच्छति कर्हि चित् ॥
जिसका स्वभाव दूषित होता है, उसके लिए वेद, त्याग, यज्ञ, संयम और तप कभी सिद्ध नहीं होते।
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