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मनुस्मृति • अध्याय 2 • श्लोक 95
यश्चैतान् प्राप्नुयात् सर्वान् यश्चैतान् केवलांस्त्यजेत् । प्रापणात् सर्वकामानां परित्यागो विशिष्यते ॥
यदि एक मनुष्य उन सब (कामुक भोगों) को प्राप्त करे और दूसरा उन सबको त्याग दे, तो उनकी प्राप्ति की अपेक्षा समस्त सुखों का त्याग कहीं अधिक अच्छा है।
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