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मनुस्मृति • अध्याय 2 • श्लोक 87
जप्येनैव तु संसिध्येद् ब्राह्मणो नात्र संशयः । कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान् मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥
मन्त्रों के जप से ही ब्राह्मण सफल होता है - इसमें कोई संदेह नहीं है। वह कुछ और करे या न करे, यदि वह मित्रवत स्वभाव का है तो उसे ब्राह्मण कहा जाता है।
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