जितना भोजन आवश्यक हो उतना इकट्ठा करके बिना किसी कपट के अपने गुरु को अर्पित करके, उसे पूर्व की ओर मुंह करके, पानी घूंट-घूंट कर खा लेना चाहिए और शुद्ध हो जाना चाहिए।
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