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मनुस्मृति • अध्याय 2 • श्लोक 51
समाहृत्य तु तद् भैक्षं यावदन्नममायया । निवेद्य गुरवेऽश्नीयादाचम्य प्राङ्मुखः शुचिः ॥
जितना भोजन आवश्यक हो उतना इकट्ठा करके बिना किसी कपट के अपने गुरु को अर्पित करके, उसे पूर्व की ओर मुंह करके, पानी घूंट-घूंट कर खा लेना चाहिए और शुद्ध हो जाना चाहिए।
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