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मनुस्मृति • अध्याय 2 • श्लोक 48
प्रतिगृह्येप्सितं दण्डमुपस्थाय च भास्करम् । प्रदक्षिणं परीत्याग्निं चरेद् भैक्षं यथाविधि ॥
अपनी पसन्द की लाठी लेकर, सूर्य को प्रणाम करके, अग्नि की परिक्रमा अपने दाहिनी ओर करके, विधिपूर्वक भिक्षा माँगे।
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