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मनुस्मृति • अध्याय 2 • श्लोक 4
अकामस्य क्रिया का चिद् दृश्यते नैह कर्हि चित् । यद् यद् हि कुरुते किं चित् तत् तत् कामस्य चेष्टितम् ॥
इस संसार में कोई भी ऐसा कर्म नहीं है जो मनुष्य द्वारा पूर्णतया बिना इच्छा के किया गया हो। मनुष्य जो कुछ भी करता है वह इच्छा का परिणाम है।
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