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मनुस्मृति • अध्याय 2 • श्लोक 245
न पूर्वं गुरवे किं चिदुपकुर्वीत धर्मवित् । स्नास्यंस्तु गुरुणाऽज्ञप्तः शक्त्या गुर्व्र्थमाहरेत् ॥
पहले शिष्य को चाहिए कि वह अपने कर्तव्यों को जानकर अपने गुरु को कुछ न दे; परन्तु जब अन्तिम स्नान करने जा रहा हो तो गुरु के आदेश पर यथासम्भव कुछ न कुछ भेंट करना चाहिए।
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